शुक्रवार, 6 नवम्बर 2026 |
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बेटे की कस्टडी मांगने वाले पिता को हाईकोर्ट से झटका! मां के पास ही रहेगी 7 साल के बच्चे की अभिरक्षा, मिलने की मिली अनुमति

ABB News Live

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बेटे की कस्टडी मांगने वाले पिता को हाईकोर्ट से झटका! मां के पास ही रहेगी 7 साल के बच्चे की अभिरक्षा, मिलने की मिली अनुमति

रायपुर :- छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने बच्चे की अभिरक्षा को लेकर एक अहम फैसला सुनाया है। 7 साल के बेटे को अपने पास रखने की मांग करने वाले पिता को कोर्ट से झटका लगा है। हाईकोर्ट ने बच्चे की कस्टडी मां के पास ही रखने के पारिवारिक न्यायालय के फैसले को बरकरार रखा है। हालांकि, पिता को बेटे से मिलने का अधिकार दिया गया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पिता सार्वजनिक स्थान पर बेटे से मुलाकात का अनुरोध कर सकते हैं, लेकिन इसके लिए पहले मां को सूचना देनी होगी और समय व स्थान को लेकर उनकी सहमति जरूरी होगी।

पिता ने फैमिली कोर्ट के फैसले को दी थी चुनौती

दरअसल, बलौदाबाजार निवासी पिता ने पारिवारिक न्यायालय के 27 अगस्त 2024 के फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। पिता की शादी 28 अप्रैल 2015 को हुई थी और 7 फरवरी 2022 को दोनों का तलाक हो गया था। इसके बाद उनका 7 साल का बेटा मां के साथ रहने लगा। पिता ने बच्चे की अभिरक्षा अपने पास देने की मांग करते हुए दलील दी थी कि वह पेशे से शिक्षक हैं और बेटे को बेहतर शिक्षा और देखभाल दे सकते हैं। उनका परिवार संयुक्त है, इसलिए घर के अन्य सदस्य भी बच्चे की परवरिश में सहयोग कर सकते हैं।

मां ने कोर्ट में रखी ये दलील

पिता की मांग का मां ने विरोध किया। उन्होंने कोर्ट को बताया कि वह बेटे की पढ़ाई और परवरिश अच्छी तरह कर रही हैं। बच्चा दूसरी कक्षा में पढ़ रहा है। मां ने यह आरोप भी लगाया कि पिता ने बच्चे के जन्म के बाद से उसकी देखभाल और उससे मिलने में कोई खास रुचि नहीं दिखाई। इसके अलावा भरण-पोषण की राशि भी नियमित रूप से नहीं दी गई। मां ने बच्चे की पढ़ाई जारी रहने के सबूत के तौर पर स्कूल फीस की रसीदें भी कोर्ट में पेश कीं।

बच्चे की खुशी और भविष्य सबसे महत्वपूर्ण : हाईकोर्ट

मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस सुषमा सावंत की पीठ ने कहा कि बच्चे की अभिरक्षा तय करने में माता-पिता के अधिकारों से ज्यादा बच्चे का कल्याण महत्वपूर्ण होता है। केवल पिता का शिक्षक होना और बेहतर शिक्षा देने की क्षमता रखना इस बात का प्रमाण नहीं है कि मां बच्चे की ठीक से देखभाल नहीं कर रही हैं। कोर्ट ने स्कूल फीस की रसीदों को भी ध्यान में रखा, जिनसे बच्चे की पढ़ाई जारी रहने की पुष्टि हुई।

पिता के साथ बच्चे का नहीं रहा सार्थक संपर्क

हाईकोर्ट ने यह भी पाया कि बचपन से ही पिता और बच्चे के बीच कोई सार्थक संपर्क नहीं रहा है। पारिवारिक न्यायालय में पेशी के दौरान भी बच्चे ने पिता के साथ जाने की इच्छा नहीं जताई थी। ऐसे में बच्चे को उसके मौजूदा माहौल से अलग करने का कोई ठोस आधार नहीं बनता। सुनवाई के दौरान पिता के वकील ने भी बच्चे की कस्टडी की मांग पर जोर देने के बजाय मुलाकात का अधिकार देने की मांग तक अपनी दलील सीमित कर दी थी।

अब इस शर्त पर पिता बेटे से कर सकेंगे मुलाकात

हाईकोर्ट ने पिता को बेटे से मिलने की अनुमति तो दी है, लेकिन इसके लिए कुछ शर्तें भी तय की हैं। कोर्ट ने कहा कि पिता किसी सार्वजनिक स्थान पर बच्चे से मिलने का अनुरोध कर सकते हैं। इसके लिए उन्हें पहले मां को सूचना देनी होगी और मुलाकात के समय व स्थान पर उनकी सहमति लेनी होगी। कोर्ट ने यह भी कहा कि मां से अपेक्षा की जाती है कि वे बच्चे के हित को प्राथमिकता देते हुए पिता के ऐसे अनुरोध पर सद्भावना से विचार करें।

हर सप्ताह मुलाकात तय करने से बच्चे पर पड़ सकता है दबाव

कोर्ट ने नियमित रूप से हर सप्ताह या हर महीने मुलाकात का समय तय करने से भी परहेज किया। अदालत का मानना था कि इससे माता-पिता के बीच विवाद बढ़ सकता है और बच्चे पर मानसिक दबाव पड़ सकता है। आखिरकार हाईकोर्ट ने बेटे की अभिरक्षा मां के पास रखने के पारिवारिक न्यायालय के फैसले को बरकरार रखा और पिता की कस्टडी संबंधी अपील खारिज कर दी। हालांकि, मुलाकात के अधिकार को लेकर सीमित संशोधन करते हुए अपील का निराकरण कर दिया।

इस फैसले में हाईकोर्ट ने साफ संदेश दिया कि बच्चे की कस्टडी का फैसला माता-पिता की व्यक्तिगत इच्छा या अधिकार के आधार पर नहीं, बल्कि बच्चे के बेहतर भविष्य, सुरक्षा और मानसिक कल्याण को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए।

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